1 और 2 जनवरी आदिवासी के लिए काला दिवस

1 और 2 जनवरी आदिवासी के लिए काला दिवस
                  खरसांवा गोली हत्याकांड               
              शहीद हुए आदिवासी क्रांतिवीर           
         🙏🏹 जोहार अभिवादन 🏹🙏               
१ और २ जनवरी काला दिवस(BACK DAY) खरसावां गोली हत्याकांड में शहीद हुए आदिवासी क्रांतिविर शहादत दिवस जोहार नमन
  भारत देश एक तरफ स्वतंत्रता दिवस की खुशियां मना रहा था ठीक ५ महीने बाद १ जनवरी १९४८ में जालियन वाला बाग से भी बोहत बढ़ा गोली हत्याकांड खरसावां में हुवा था| इस हत्याकांड में ३० हजार से भी ज्यादा आदिवासी को अंधाधुद फायरिंग में मौत के घाट उतारा गया|
 आज़ाद भारत का यह पहला बड़ा गोलीकांड माना जाता है. इस घटना में कितने लोग मारे गए इस पर अलग-अलग दावे हैं और इन दावों में भारी अंतर है|

उड़ीसा राज्य में विलय का विरोध

   इस गोलीकांड का प्रमुख कारण था खरसावां के उड़ीसा राज्य में विलय का विरोध. अनुज सिन्हा बताते हैं, "आदिवासी और झारखंड (तब बिहार) में रहने वाले समूह भी इस विलय के विरोध में थे. मगर केंद्र के दवाब में सरायकेला के साथ ही खरसावां रियासत का भी उड़ीसा में विलय का समझौता हो चुका था|
   1 जनवरी, 1948 को यह समझौता लागू होना था. तब मरांग गोमके के नाम से जाने जाने वाले आदिवासियों के सबसे बड़े नेताओं में से एक और ओलंपिक हॉकी टीम के पूर्व कप्तान जयपाल सिंह मुंडा ने इसका विरोध करते हुए आदिवासियों से खरसावां पहुंचकर विलय का विरोध करने का आह्वान किया था. इसी आह्वान पर वहां दूरदराज इलाकों से लेकर आस-पास के इलाकों के हजारों आदिवासियों की भीड़ अपने पारंपरिक हथियारों के साथ इकठ्ठा हुई थी."
   आंदोलन के नेतृत्वकर्त्ता जयपाल सिंह मुंडा थे, लेकिन वे खुद उस दिन खरसावां नहीं पहुंचे। दूसरी तरफ ओड़िसा सरकार पीकिसी भी हाल में खरसावां में 1 जनवरी को सभा नहीं होने देना चाहती थी और खरसावां हाट उस दिन ओड़िसा मिलिट्री पुलिस का छावनी बन गया था। वहीं कोई नेतृत्व नहीं होने के कारण भीड़ का धैर्य जवाब दे चुका था। इसी दौरान अचानक ओड़िसा मिलिट्री पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग की इस फायरिंग दौरान किसी को जान बचाने जगह नहीं मिली जो ३० हजार से भी ज्यादा आदिवासी को मौत के घाट उतारा गया जब तक गोलीबारी रुकी, पूरा मैदान लाशों से पट गया था।"। 
जिस स्थान पर नरसंहार हुआ था उसके पास ही एक कुआँ था। पुलिस ने उसमें शवों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया। कुआँ शवों से भर जाने के बाद, बाकी को जंगल में ले जाया गया और वहाँ फेंक दिया गया।
इस गोलीकांड को लेकर सात दशक से अधिक समय बीत चुका है, कई जांच कमेटिया भी बनी, लेकिन आज तक इस घटना पर कोई रिपोर्ट नहीं आयी। खरसावां गोलीकांड का जनरल डायर कौन है, इसका आज तक कोई खुलासा नहीं हुआ।

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