भारत स्वतंत्रता संग्राम में इतिहास के पन्नो में आदिवासी क्रांतिवीरोंका इतिहास नही लिखा गया|
भारत स्वतंत्रता संग्राम में इतिहास के पन्नो में आदिवासी क्रांतिवीरोंका इतिहास नही लिखा गया|
भारत आजादी के ७६ साल इस वर्ष मनाया गया लेकिन इस भारत वर्ष के लिए शहीद होनेवाले क्रांतिविरोंका इतिहास हमे पढ़ाया गया|जिसमे १८५७ से आजादी की पहली लड़ाई अग्रेजी सत्ता के विरोध में मंगल पांडे ने विद्रोह किया था|और कई स्वतंत्र सेनानी हो गए|
स्वतंत्रता के लिए शहीद होनेवाले मंगल पांडे,वीर भगतसिंग,वीर राजगुरु,वीर सुकदेव,वीर चंद्रशेखर आजाद,वीर सुभाष चंद्र बोस और अन्य क्रांतिवीर का इतिहास पढ़ाया गया|इसी तरह स्वतंत्र सेनानी जिन्होंने अपना जीवन भारत स्वतंत्रता के लिए बढ़ा योगदान दिया।जैसे महात्मा गांधी,पंडित जवाहरलाल नेहरू,लाल बहादुर शास्त्री,सरदार वल्लभभाई पटेल,लोकमान्य तिलक और अन्य स्वतंत्र सेनानी का इतिहास पढ़ाया गया और लिखा गया|लेकिन आदिवासी का इतिहास लिखनें में इतिहासकारोंकी लिखनेवाली स्याही खत्म हो गई या जान बुझकर आदिवासी क्रांतिविरोंका इतिहास नही लिखा नाही हमे पढ़ाया गया|जो भारत स्वतंत्रता पहला बिगुल १८ शताब्दी_१७८५ में तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाड़िया के नाम से पहचाने जानेवाले के नैतुत्व में हुवा था|याने मंगल पांडे का जन्म से पहले ही भारत देश में आदिवासी का विद्रोह चल रहा था|सिर्फ अपने भारत देश को बचाने और हमारे जल,जंगल,जमीन बचाने के लिए|भारत देश में आदिवासी क्रांतिविरोंका विद्रोह के बारे में थोड़ी जानकारी होनी चाहिए जो हमे पता नही|
कोल विद्रोह:
यह 1820से 1836 तक हुआ छोटा नागपुर के कोलो ने अपना क्रोध उस समय प्रकट किया जब उनकी भूमि उनके मुखियाओ से छिन के कृषिक मुस्लिमों तथा सिक्खों को दे दी गई 1831 ई. में कोलो ने लगभग 1हजार विदेशी व बाहरी लोगों को या तो जला दिया या हत्या कर दी
एक दीर्घ कालीन तथा विस्तृत सैनिक अभियान के पश्चात ही अशांत ग्रस्त इलाके जैसे कि राँची, हजारीबाग, पलाम इन सभी क्षेत्रों में शांति स्थापित हो सकी
संथाल तिलका माझी का विद्रोह:
भारत देश की आजादी के लिए पहले स्वतंत्र सेनानी जबरा पहाड़िया तिलका मांझी थे जो संथाल समुदाय के पहले आदिवासी नेता थे। उन्होंने मंगल पांडे से लगभग 70 साल पहले 1784 में अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए थे।1770 के आसपास संथाल परगना सूखे से बुरी तरह प्रभावित था और लोग भूख से मर रहे थे। सत्ता में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने लोगों को भोजन और राहत प्रदान करने के बजाय आदिवासी समुदायों का शोषण करना शुरू कर दिया। तिलका मांझी ने आदिवासियों को संगठित किया और 1772 में ब्रिटिश उत्पीड़न के खिलाफ विद्रोह किया|तिलका मांझी 1784 में इन्होने ने क्लीवलैंड की ह्त्या की थी. उसके बाद आयरकुट के नेतृत्व में तिलका की गुरिल्ला सेना पर हमला किया गया था जिसमें कई लड़ाके मारे गए और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. कहते हैं उन्हें चार घोड़ों में बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया गया था. तिलका की लाल आँखे देख अंग्रेज़ घबरा गए थे|उनके कटे शरीर को सार्वजनिक रूप से एक बरगद के पेड़ से लटका दिया गया। भारत की आजादी के बाद भागलपुर में उस स्थान पर जहां उन्हें फांसी दी गई थी, तिलका मांझी की एक प्रतिमा स्थापित की गई है।
वीर सिद्धू कान्हु (संथाल विद्रोह)हुल आंदोलन:
संथाल विद्रोह (हूल आंदोलन) का नेतृत्व सिद्धू-कान्हु ने किया था । सिद्धू-कान्हु के नेतृत्व में इस लड़ाई में संथाल परगना के स्थानीय आदिवासीयों एवं गैर आदिवासीयों ने जान की बाजी लगाकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ाई लड़ी।
सिद्धू-कान्हू ,चांद_बैरव भाई-बहनों के नेतृत्व में 30 जून 1855 को पंचकठिया, बरहेट जिला साहेबगंज में पूरे जंगल तराई के तमाम विद्रोहियों व उनके समर्थकों की एक सभा बुलाई। सभा में सिद्धू को उनका नेता चुना गया और उनके नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलन चलाने का निर्णय लिया गया। उसके बाद हजारों लोग ने सिद्धू-कान्हू के नेतृत्व में ब्रिटिश सत्ता, साहुकारों, व्यापारियों व जमींदारों के खिलाफ हूल - हूल के नारा के साथ सशस्त्र युद्ध का शुरूवात किया, जिसे संथाल विद्रोह या हूल आंदोलन के नाम से जाना जाता है। संथाल विद्रोह का नारा था- "करो या मरो अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो" । 30 जून 1855 की सभा 400 गांव के में 50000 से भी ज्यादा आदिवासी एकत्र हुए जिसमें सिद्धू, कान्हू, चाँद एवं भैरव को उनका नेता चुना गया।
संथाल विद्रोह भोगनाडीह से शुरू हुआ जिसमें संथाल तीर-धनुष से लेस अपने दुश्मनो पर टुट पड़े।
जबकि अंग्रेजो मे इसका नेतृत्व जनरल लॉयर्ड ने किया जो आधुनिक हथियार और गोला बारूद से परिपूर्ण थे इस मुठभेड़ में महेश लाल एवं प्रताप नारायण नामक दरोगा कि हत्या कर दि गई इससे अंग्रेजो में भय का माहोल बन गया।
संथालो के भय से अंग्रेजो ने बचने के लिए पाकुड़ में मार्टिलो टावर का निर्माण कराया गया था जो आज भी झारखण्ड के पाकुड़ जिले में स्थित है। अंततः इस मुठभेड़ में संथालो कि हार हुई और सिदो-कान्हू को फांसी दे दी गई।
अहोम विद्रोह:
1828से 1830 तक असम के अहोम वर्ग के लोगों ने कम्पनी पर वर्मा युध्द के दौरान दिये गये वचनों को पूरा ना करने का दोषारोपण किया और अंग्रेज अहोम प्रदेश को भी अपने प्रदेश में सम्मिलित करने का प्रयास कर रहे थे परिणामस्वरुप अहोम लोगों ने गोमधर कुँवर को अपना राजा घोषित कर दिया और 1828 में रंगपुर पर चढाई करने की योजना बनाई और 1830 में दूसरे विद्रोह की योजना बनाई
कम्पनी के अच्छे सैन्य बल और शांतिमय योजना के कारण इस विद्रोह को असफल बना दिया|
भील विद्रोह 1818:
यह विद्रोह, देश में आदिवासी भीलसमूह द्वारा किए गए पहले विद्रोहों में से एक था । विद्रोह का कारण मुख्यतः ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों भीलों से क्रूर व्यवहार था, जिसने उन्हें उनके पारंपरिक वन अधिकारों से वंचित कर दिया और उनका शोषण किया । अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए सेना भेजी और वे इसमें कामयाब भी हुए । लेकिन यह विद्रोह व्यर्थ नहीं गया, क्योंकि अंग्रेजों ने विभिन्न करों में रियायतें दीं और शांति समझौते के तहत वन अधिकार वापस कर दिए ।
भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना के साथ ही विद्रोह- आंदोलनों का इतिहास भी प्रारंभ होता है । जनजातीय आंदोलन भी इसके अपवाद नहीं हैं । भारत के जनजातीय आंदोलनों का क्षेत्र या स्वरूप कोई भी हो, कुछ बातें मूल रूप से सामान्य पाई जा सकती हैं । इनमें प्रमुख था ब्रिटिश शासन द्वारा जनजातीय जीवन शैली, उनकी सामाजिक संरचना व उनकी संस्कृति में हस्तक्षेप करना । इसने पूरे देश में जनजातिय असंतोष को जन्म दिया। ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के साथ-साथ जनजातीय क्षेत्रों में जमींदार , महाजन और ठेकेदारों के एक नए शोषक समूह का उद्भव हुआ । आरक्षित वन सृजित करने और लकड़ी तथा पशु चराने की सुविधाओं पर भी प्रतिबन्ध लगाए जाने के कारण आदिवासी जीवन -शैली प्रभावित हुई क्योंकि आदिवासियों का जीवन सबसे अधिक वनों पर ही निर्भर करता है । 19वीं सदी में झूम कृषि पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया । नए वन कानून बनाए गये । इन सब कारणों ने देश के विभिन्न भागों में जनजातिय विद्रोहों को जन्म दिया । इन्हीं में से एक भीषण विद्रोह था भील विद्रोह ।
मुंडा विद्रोह:(उलगुलान क्रांती) (1899-1900 )
मुंडा विद्रोह आंदोलन के नायक बिरसा मुंडा को ‘धरती आबा‘ एवं ‘बिरसा भगवान‘ भी कहते हैं। इनका जन्म 15 नवम्बर, 1875 को उलिहातू गांव में हुआ था।
भगवान बिरसा मुंडाके नेतृत्व में हुए इस विद्रोह को उलगुलान विद्रोह भी कहा जाता है। इस विद्रोह का मुख्य कारण था-दिकुओं एवं जमींदारों द्वारा शोषण एवं उत्पीड़न। तत्कालीन सामाजिक जीवन में जो मौलिक परिवर्तन आ रहे थे, उनके कारण आदिवासी समाज में चिंता का वातावरण था और लोग एक शांतिपूर्ण और आदर्श समाज की कल्पना से प्रेरित थे।ब्रिटिश सत्ता के अस्तित्व को अस्वीकार करते हुए अपने अनुयायियों को सरकार को लगान न देने का आदेश दिया। उसके उपदेशों से अनेक लोग प्रभावित हुए, जिससे धीरे-धीरे बिरसा आंदोलन का व्यापक प्रसार हुआ। आगे चलकर यह आंदोलन असफल हो गया, किन्तु सामाजिक विषमता, आर्थिक शोषण और विदेशी सत्ता के फलस्वरूप हुए परिवर्तन के प्रति यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी।
बिरसा ने सशस्त्र विद्रोह की योजना बनायी थी, परन्तु 24 अगस्त, 1895 को वे मेयर्स द्वारा कैद कर लिये गये। 30 नवम्बर, 1897 को उन्हें ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती मनाने के अवसर पर मुक्त कर दिया गया।
डुबारू बुरू में बिरसा ने अपने विश्वासपात्र लोगों, मंत्रियों और प्रतिनिधियों की एक सभा बुलायी, जिसमें 25 दिसम्बर, 1899 को विद्रोह करने का निर्णय लिया गया।
25 दिसम्बर, 1899 को खूटी, रांची, तमाड़, बसिया, चक्रधरपुर आदि जगहों पर इनके नेतृत्व में आंदोलन हुआ।
इन्होंने दोन्का मुंडा को राजनीतिक एवं सोमा मुंडा को धार्मिक एवं सामाजिक मामलों का प्रमुख बनाया।
इनके प्रमुख सहयोगी गया मुंडा थे, जिन्हें सेनापति नियुक्त किया। जोहन मुंडा, रीढ़ा मुंडा, पंडु मुंडा, टिपरू मुंडा, डेमका मुंडा, हाथेराम मुंडा आदि को बिरसा ने सलाहकार के रूप में प्रयोग किया।
खूटी, तोरपा, बुंडू, कर्रा, रांची, सिसई, बसिया आदि क्षेत्रों में बिरसा सैनिक सक्रिय थे।
बिरसा आंदोलन का मुख्यालय खूटी था। इस आंदोलन को भी सरदारी आंदोलन माना जाता है। क्योकि सरदारी आन्दोलन के लोग मुण्डा विद्रोह में सम्मलित हो गए थे।
इस विद्रोह के समय रांची के उपायुक्त स्ट्रेटफील्ड थे।
3 फरवरी, 1900 ई. को बंदगांव के जगमोहन सिंह के आदमी वीर सिंह महली आदि ने 500 रुपये ईनाम के लालच में बिरसा मुंडा को गिरफ्तार करवा दिया।
धरती आबा बिरसा मुंडा की मृत्यु 9 जून, 1900 को रांची जेल में हैजा से हुई। यह अग्रेजों का बयान था लेकिन उनको खाने में जहर देकर मारा गया भगवान बिरसा मुंडा की मृत्यु भले हुई थी लेकिन उनके आंदोलन के परिणामस्वरूप 1902 ई. में गुमला को एवं 1903 ई. में खूटी को अनुमंडल बनाया गया।
टंट्या भील: टंट्या मामा:
टंट्या भील का जन्म 26 जनवरी 1840 को मध्य प्रदेश के बड़ादा गाँव में हुआ था । उनके पिता का नाम भाऊसिंह था । टंट्या भील का मूल नाम तंद्रा था , लेकिन समय के साथ यह नाम टंट्या हो गया। बाद में यह नाम प्रसिद्ध हो गया। फलस्वरूप हम उन्हें टंटया के नाम से भी याद रखेंगे। उनके दुबले-पतले शरीर के कारण उन्हें टंट्या भील (भारत का रॉबिनहुड) कहा जाने लगा। टंटया का संबंध मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र से रहा है और निमाड़ में ज्वार का पौधा सूखने के बाद लंबा और पतला होने के कारण टंटया कहलाता है। इसके अलावा टंट्या भील को भारत का रॉबिनहुड भी कहा जाता है।
विद्रोह के कारण:
भूमि हस्तांतरण की ब्रिटिश नीति, जिसने कई भील परिवारों को उनकी पैतृक संपत्ति से बेदखल कर दिया, ने विद्रोह को जन्म दिया।
यह दृष्टिकोण क्षेत्र पर ब्रिटिश नियंत्रण को मजबूत करने और इसके संसाधनों का उपयोग करने की एक बड़ी योजना का हिस्सा था।
अंग्रेजों की शोषणकारी प्रथाओं, साथ ही भील लोगों पर लगाए गए भारी करों ने विद्रोह को प्रेरित किया।
टंट्या भील ने 19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश राज के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया।
उन्हें उनकी बहादुरी और नेतृत्व के साथ-साथ भील लोगों को वश में करने के ब्रिटिश प्रयासों के विरोध के लिए जाना जाता है।
विद्रोह मध्य और पश्चिमी भारत तक फैल गया और कई महीनों तक चला।
भील योद्धा तैयार नहीं थे और उन्होंने अपने आदिम हथियारों से ब्रिटिश सेना का सामना किया ।
इसके अलावा, ब्रिटिश सैनिकों ने हिंसक तरीके से विद्रोह को दबा दिया और कई भील योद्धा मारे गए या कैद कर लिए गए।
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टंट्या भील - गिरफ्तारी
टंट्या भील को 19वीं सदी में ब्रिटिश राज के खिलाफ विद्रोह के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने पकड़ लिया था। उनके कारावास की सटीक परिस्थितियाँ और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप अज्ञात हैं, हालाँकि ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ाई में अपने समर्थकों का नेतृत्व करते समय उन्हें संभवतः पकड़ लिया गया था।
टंट्या भील की मृत्यु
टंट्या भील को अंग्रेजों ने पकड़ लिया (गिरफ्तार कर लिया) और कैद में ही उसकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु तिथि और मृत्यु का कारण अज्ञात है । ब्रिटिश सैनिकों ने हिंसक तरीके से विद्रोह को दबा दिया और कई भील योद्धा मारे गए या जेल में डाल दिए गए। ब्रिटिश अधिकारियों ने भील लोगों पर कठोर दंड लागू किया, जिससे कई लोगों को अपने गांव खाली करने के लिए मजबूर होना पड़ा। भील समुदाय विद्रोह से बहुत प्रभावित हुआ, जिसे आत्मनिर्णय और सम्मान के लिए उनकी लड़ाई का प्रतीक माना जाता है।
क्रांतिवीर खाज्या नायक:(रावलापान) हत्याकांड
सातपुड़ा प्रदेश भील आदिवासी नायक 1831 से 1851 तक अंग्रेजों की सेवा में थे। उन्होंने सेंधवा घाट क्षेत्र से यात्रा करने वाले व्यापारियों की सुरक्षा का कठिन कार्य किया। वह गोंड भील पुलिस दल के प्रमुख थे जो घने जंगल से गुजरने वाली बैलगाड़ियों की सुरक्षा करते थे। उनके हाथों से एक डाकू मारा गया और इस कारण उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें 10 साल की जेल की सजा सुनाई गई। 1855 में सजा काटने के बाद वे अपनी नौकरी पर लौटना चाहते थे, लेकिन तभी 1857 की क्रांति का माहौल गर्म होने लगा। अंग्रेजों को निजी नायकों की जरूरत पड़ने लगी थी, लेकिन अब वे अलग-अलग प्रेरणा से भरे हुए थे। जब देश में कोई भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ खड़ा नहीं हो सका तो उन्होंने विद्रोह का झंडा उठा लिया। उनके साथी भीमा नाइक, मेवश्या नाइक दौड़ते हुए आये, उन्होंने 2200-2500 आदिवासियों को इकट्ठा किया और ब्रिटिश उपनिवेशों और खजाने को लूटना शुरू कर दिया और जब उन्होंने अंग्रेजों को युद्ध के लिए ललकारा, तो उन्हें हनुमंत राव भील मिल गये। आसपास के गांवों में क्रांतिकारी ज्वाला और अंग्रेजों के मन में दहशत पैदा करके उन्होंने सेंधवा घाट के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया, उत्तर और दक्षिण भारत में ब्रिटिश रसद को अवरुद्ध कर दिया और अंग्रेजों के स्थान पर नियंत्रण लेकर स्वयं कर वसूलना शुरू कर दिया। होल्कर के राज्य से अंग्रेजों द्वारा एकत्रित किया गया नजराना खजाना बंबई जा रहा था, इसे क्रांतिवीर खाज्या नाइक ने लूट लिया, इसकी रकम लगभग ७०,००,००० रुपये थी, और इसकी सुरक्षा 1500 सैनिकों द्वारा की गई थी लेकिन उन्होंने क्रांतिकारी खाज्या नाइक के भील और गोंड आदिवासी क्रांतिकारियों के प्रतिरोध के बिना आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेजों को इतना बड़ा झटका किसी ने नहीं दिया था. अंग्रेज घबरा गये और उन्हें विश्वास हो गया कि यदि क्रांतिकारी खाज्या नायकों को नहीं बसाया गया तो भारत में सत्ता टिक नहीं पायेगी। महादेव नाइक और दौलत नाइक भी क्रांतिकारी खाज्या नाइक की सेना में शामिल हो गए, तापी नर्मदा घाटी, सातपुड़ा और विंध्य सातपुड़ा पर्वत, अकरानी महल, निमाड़, मारवा मेवासी सहित पूरे सातपुड़ा क्षेत्र में आदिवासी क्रांति की आग भड़क उठी। ब्रिटिश: क्रांतिकारी कालूबाबा नाइक। इन क्रांतिकारी खाज्या नायकों के साथ-साथ होल्कर की धार रियासत के रोहिले, मकरानी और अरब सैनिक भी आए, साथ ही बड़ौदा गायकवाड़ रियासत, काठी, गंगथा, तड़वी, पााडवी ,मावची, चोधरी आदिवासी सैनिक और अधिकारी भी आए। , रियासत के आदिवासी सैनिक और रायंगन के ठिगले भील और अंत में मराठा सरदार खाजी आये और स्वागत किया।।अब चोरोंऔर आदिवासी सेनाएं अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ी हुईं, "सुल्तानपुर" की आदिवासी सेनाओं ने "सारंगखेड़ा" में अंग्रेजों पर हमला कर दिया, रायंगन के थिंगले सरदार ने रायकोट किले में अपने वसावा आदिवासी कमांडरों के साथ सोनगढ़ पर हमला कर दिया। चूंकि गायकवाड़ी सेना ने विरोध नहीं किया था अंग्रेज़ों, थिंगल सरदार को कई सैनिक खोने पड़े लेकिन भीलनी ने अंग्रेज़ों और ब्रिटिश राजघरानों को भागने दिया। मांडणे गांव के रुमाल्या नाइक अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर रहे थे. अब अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए अस्थायी प्रयास शुरू कर दिये थे। ब्रिटिश सैनिकों की रेजीमेंटें बढ़ायी गयीं और साथ ही कई ब्रिटिश अधिकारी नियुक्त किये गये। इतना ही नहीं, आदिवासी भील क्रांतिकारियों से लड़ने के लिए महाराष्ट्र के खानदेश की महादेव कोली जनजाति की एक पलटन बनाई गई। महादेव कोली अंग्रेज सैनिक आदिवासियों को जगह-जगह घेर रहे थे और उनकी ताकत कम कर रहे थे। तभी मेजर इवांस को खबर मिली कि क्रांतिकारी खाज्या नाइक और उनके 30,000 क्रांतिकारी भील साथी बड़वानी अंबापानी के जंगलों में शरण लिए हुए हैं और उन्होंने घेराबंदी कर दी। हालाँकि, जिन आदिवासियों ने आत्मसमर्पण किया, उन्होंने पास के तीर धारा भिलखी और कुछ बंदूकों के दम पर लड़ना शुरू कर दिया, लेकिन वे अंग्रेजों द्वारा तैनात सैनिकों और अत्याधुनिक बंदूकों के सामने ज्यादा टिक नहीं सके, लेकिन उन्होंने बड़े साहस के साथ लड़ाई की और दो ब्रिटिश अधिकारियों को मार डाला और 1800 सैनिक. यह आदिवासियों का नुकसान था. 2460 स्त्री-पुरुषों को कैद कर लिया गया। खाज्या नाइक, मेवश्या नाइक, भाई रावल की पत्नियों को कैद कर लिया गया और खाज्या नाइक का बेटा "पोलादसिंह" 'शहीद' हो गया। 1,500 से अधिक कैदियों की मौके पर ही गोली मारकर हत्या कर दी गई। क्रांतिवीर खाज्या नायक अपने असंख्य साथियों का कत्लेआम और अपने परिवार की हानि देखकर भी नहीं थके।वे अंग्रेजों से लड़ते रहे, जब तक कि अंततः अंग्रेज उन्हें अलग-थलग करने में सफल नहीं हो गए और उन्हें सशर्त माफी मांगने और धुले के कलेक्टर के सामने आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया। लेकिन उन्होंने सशर्त माफ़ी देने से इनकार कर दिया और जवाब दिया कि अगर पूरी माफ़ी दे दी जाए तो हम आत्मसमर्पण कर देंगे। यह अंग्रेजों का अपमान था इसलिए वार्ता विफल हो गई और इसका कोई फायदा नहीं हुआ खाज्या नायकों ने 26/10/1857 को आदिवासी क्षेत्र नीमाड़ पाटी के शिरपुर में ब्रिटिश खजाने को लूट लिया और अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंक दी। उनके साथ केवल 150 भील थे। वर्ष 17/11/1857 में क्रांतिवीर खाज्या नाइक और भीमा नाइक ने 7,00,000 का ब्रिटिश खजाना लूट लिया। 11 अप्रैल, 1858 को मेजर इवांस ने तलोदा के पास अम्बापानी के जंगल में खाज्या नाइक, दौलत सिंह नाइक, कालूबाबा नाइक सहित 2500 भील सैनिकों को घेर लिया और हमला कर दिया। क्रांतिवीर खाज्या नाइक के साथ 1570 लोगों को ढोल की आवाज के साथ गोली मार दी गई और उनके सिर काट कर सेंधवा के किले के बाहर फेंक दिए गए ताकि जो भी दोबारा विद्रोह करेगा उसका यही हश्र हो और 400 महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया गया। देखा गया है कि किसी भी शिक्षा के पुस्तकों में लड़ाई का जिक्र जान बूझकर जान बूझकर छुपाया|
और कई आदिवासी क्रांतिवीर जिन्होंने सिर्फ अपने,जल,जंगल ,जमीन और रूढ़िगत व्यवस्था ,धर्मपूर्वी संकृति बचाने के लिए अपने प्राण गवाए लेकिन अग्रेजों की गुलामी नही की नाही अपना सर झुकाए|
आज आदिवासी का इतिहास सामने आ रहा है ,लेकिन दुःख इस बात की है की आदिवासी का इतिहासकारों ने नही लिखा नाही आदिवासी को बदलाया गया|
भारत देश के लिए शहादत देनेवाले सभी आदिवासी क्रांतिविरोंको जोहार अभिवाद🙏

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