3 जनवरी 1903 आदिवासी के मसीहा जयपालसिंह मुंडा जयंती जोहार अभिवादन

                 
                    3 जनवरी 1903
      आदिवासी के मसीहा जयपालसिंह मुंडा
भारत देश के पहले हॉकी कप्तान जिन्होंने भारत देश को पहला गोल्ड मेडल दिलाया था। 
            भारतीय संविधान सभा सदस्य
     संविधान 5 वी 6 टी अनुसूची रचिता 
    आदिवासी के मसीहा जयपालसिंह मुंडा जयंती
                   जोहार अभिवादन 
                                                                   
1928 ओलंपिक में हॉकी में पहला स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम के कप्तान और संविधान सभा में आदिवासियों के सबसे बड़े पैरोकार आजादी के 76 बरस बाद भी रहे गुमनाम।
बीते 03 जनवरी को, आदिवासियों के भाग्य को संविधान मे लिखने वाले जयपाल सिंह की जयंती थी। देश के आदिवासियों को ही यह ज्ञात नहीं है कि जयपाल सिंह मुंडा कौन हैं और हमारे सुनहरे भविष्य को गढ़ने मे उनका क्या योगदान है। बैसाखी के सहारे खडे हो रहे और चलना सीख रहे लोग जब बैसाखी की उपेक्षा करने लग जाय, तब उसका गिरना तय माना जाता है। वर्तमान में आदिवासियों की स्थिति इसी प्रकार की है।
जयपाल सिंह मुंडा का जीवन परिचय
जयपाल सिंह मुंडा एक जाने माने खिलाड़ी राजनीतिज्ञ, पत्रकार, लेखक, संपादक, शिक्षाविद् और कुशल प्रशासक थे। वे आदिवासी अधिकारो और आदिवासी राज्य झारखंड के प्रणेता थे। जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 3 जनवरी, 1903 को खूंटी के टकरा पाहनटोली में हुआ था। जयपाल ‘मुंडा’ आदिवासी समुदाय से थे। इनके पिता का नाम अमरू पाहन तथा माता का नामराधामणी था। इनके बचपन का नाम प्रमोद पाहन था। वह असाधारण रूप से प्रतिभाशाली थे।
जयपाल सिंह मुंडा की शिक्षा
 जयपाल सिंह मुंडा की प्रारंभिक शिक्षा उनके पैत्रिक गांव में ही हुई। उन्हे सन 1910 में रांची के चर्च रोड स्थित एसपीजी मिशन द्वारा स्थापित संत पॉल हाईस्कूल में दाखिला मिला और यहीं से 1919 में प्रथम श्रेणी से मैट्रिक पास किया। सन 1920 में जयपाल सिंह को कैंटरबरी के संत अगस्टाइन कॉलेज में दाखिला मिला। सन 1922 में आक्सफोर्ड के संत जांस कॉलेज में दाखिला मिला।
जयपाल सिंह मुंडा की प्रारंभिक शिक्षा उनके गृह ग्राम टकरा में ही हुई उसके बाद 03 जनवरी 1911 को वे रांची के सेंट पॉल स्‍कूल में आ गये इस स्‍कूल के प्रिंसीपल कासग्रेव थे। जयपाल सिंह मुंडा बचपन से ही पढ़ाई में बहुत ही प्रतिभाशाली छात्र थे। पढ़ाई के साथ साथ खेल में भी उनकी गहरी रूची थी। उनके पढ़ाई और खेल के प्रति लगन को देखकर प्रिंसीपल कासग्रेव ने जयपाल सिंह मुंडा के प्रतिभा को पहचाना और काफी प्रभावित हुए। प्रिंसीपल कासग्रेव जयपाल सिंह मुंडा के प्रारम्भिक गुरू भी थे।

जब कासग्रेव प्रिंसीपल के पद से सेवानिवृत हुए उसके बाद उन्‍होने जयपाल सिंह मुंडा को इंग्‍लैण्‍ड लेकर चले गये। और इंग्‍लैण्‍ड में ही जयपाल सिंह मुंडा ने अपना ग्रेजुएशन राजनीति, अर्थशास्‍त्र, और फिलासॉफी में पूरा किया। उसके बाद मास्‍टर डिग्री के लिए ऑक्‍सफोर्ड के सेंट जॉन्‍स कॉलेज में एडमिशन लिया और अर्थशास्‍त्र में उन्‍होनें मास्‍टर डिग्री पूरी की। पढ़ाई के अलावा उन्‍हे हॉकी खेलने का शौक था। और वाद‍ विवाद में भी उन्‍होने खूब नाम कमाया।


जयपाल सिंह मुंडा ने हॉकी में भारत को पहला गोल्‍ड मेडल दिलाया
जयपाल सिंह नामित कप्तान थे। एक मुंडा आदिवासी, जयपाल को मिशनरियों द्वारा ऑक्सफोर्ड में अध्ययन करने के लिए लंदन भेजा गया था और उन्होंने इंग्लैंड में एक हॉकी खिलाड़ी के रूप में अपना नाम कमाया था, जिसमें प्रतिष्ठित विश्व हॉकी पत्रिका भी शामिल थी।
     उनका चयन भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) में हो गया था। ऐसा करने वाले वह पहले आदिवासी थे। आईसीएस का उनका प्रशिक्षण प्रभावित हुआ क्योंकि वह 1928 में एम्सटरडम में ओलंपिक हॉकी में भारतीय टीम के कप्तान के रूप में नीदरलैंड चले गए थे। उन्हें 1928 के ओलंपिक में भाग लेने के लिए छुट्टी नहीं दी गई थी। हालाँकि, उन्होंने चेतावनियों पर कोई ध्यान नहीं दिया और दस्ते के साथ एम्स्टर्डम की यात्रा की। वापसी पर उनसे आईसीएस का एक वर्ष का प्रशिक्षण दोबारा पूरा करने को कहा गया, उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया लेकिन हाकी के मोह को न छोड़ पाने के कारण सिविल सेवा से त्यागपत्र दे दिया था। उनकी कप्तानी में भारत ने ओलंपिक का प्रथम स्वर्ण पदक जीता। ब्रिटेन में वर्ष 1925 में ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ का खिताब पाने वाले हॉकी के एकमात्र अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी थे।

ओलंपिक के बाद
जयपाल लंदन से लौट कर आने बाद उनहों ने कोलकाता में बर्मा सेल में नौकरी जॉइन कर ली बाद में रायपुर स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल नियुक्त हुए। इसी क्रम में कुछ दिनों तक बीकनर नरेश के यहाँ राजस्व मंत्री की नौकरी भी की। बीकनर के राजा कि नौकरी छोडकर सन् 1938 में आदिवासी महासभा के अध्यक्ष बने। 1938 की आखिरी महीने में जयपाल ने पटना और रांची का दौरा किया। इसी दौरे के दौरान आदिवासियों की खराब हालत देखकर उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया। इसके बाद जयपाल सिंह देश में आदिवासियों के अधिकारों की आवाज बन गए।
     

संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा:
भारतीय संविधान को बनाने में जिन नायकों की भूमिका रही है रही है, उनमें जयपाल सिंह का विशिष्ट स्थान है। “मैं उन उन लाखों अज्ञात लोगों की ओर से बोलने के लिए यहां खड़ा हुआ हूं, जो सबसे महत्त्वपूर्ण लोग हैं, जो आजादी के अनजान लड़ाके हैं, जो भारत के मूल निवासी हैं और जिनको बैकवर्ड ट्राइब्स, प्रिमिटिव ट्राइब्स, क्रिमिनल ट्राइब्स और जाने क्या-क्या कहा जाता है।” यह शब्द हैं जयपाल सिंह मुंडा के जो 1946 में खूंटी ग्रामीण क्षेत्र से कांग्रेस के पूरनोचन्द्र मित्र को हरा कर संविधान सभा के सदस्य बने। वे संविधान सभा में आदिवासियों के सबसे बड़े पैराकार बन कर उभरे।
संविधान सभा में आदिवासी समुदाय के सिर्फ 10 सदस्य ही निर्वाचित हूये। उनमें से 9 सामान्य निर्वाचन क्षेत्र और 1 रियासतों के प्रतिनिधि के तौर पर चुने गये थे। लेकिन ड्राफ्टिंग के समय लगभग आधे से अधिक आदिवासी सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो चुका था या उन्हें उस समय करने का मौका नहीं मिला। इसलिए सारा भार जयपाल सिंह मुंडा जी, उत्तर पूर्वी जे.जे.एम. निकोल्स राय व ठा. रामप्रसाद पोटाई (रियासत प्रतिनिधि) पर आ गया। एक जनवरी 1948 को हुए खरसावां गोली कांड ने उन्हें बहुत दुखी किया इसके बाद उन्होने एक आदिवासी महासभा का नाम बदल कर झारखंड पार्टी नामक राजनैतिक दल बनाया।



भारत का संविधान जब तैयार किया जा रहा था तब जयपाल सिंह मुंडा ने कहा था, “हमलोग आजादी के पहले लड़ाके हैं. लोकतंत्र के निर्माता. आपलोग आदिवासियों को लोकतंत्र नहीं सिखा सकते, बल्कि समानता, सहअस्तित्व और लोकतंत्र उनसे ही सीखना होगा” देश के आदिवासियों के मौलिक अधिकारों, वोटिंग के अधिकार और संविधान में निहित आज देश में आदिवासियों को तमाम तरह के अधिकार, नौकरियों और प्रतिनधित्व में आरक्षण, 

संविधान सभा में मौलिक अधिकारों पर चर्चा के दौरान आदिवासियों के जमीन पर अधिकार को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 13) में शामिल किये जाने की मांग (30 अप्रैल 1948) को मजबूती से उठाया गया ताकि भविष्य में आदिवासियों की बेदखली और शोषण को रोका जा सके। इसके लिये विशेष प्रावधानों की जरूरत थी।


जब अनुसूचित क्षेत्रों पर चर्चा आखिरकार सितंबर 1949 में हुई, जो ‘आदिवासी क्षेत्रों के शासन के लिए प्रावधान शामिल हैं, सत्ता के हस्तांतरण को सक्षम बनाता है, उनकी परंपराओं और प्रथाओं की रक्षा करता है और सबसे महत्वपूर्ण, उनके भूमि अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी देता है’।


जयपाल सिंह मुंडा जी ने संविधान सभा में अनुच्छेद 13(3)(क) की मांग की थी, जिसका उद्देश्य आदिवासी समाज के संविधानिक अधिकारों और संविधान के तहत सुरक्षा को सुनिश्चित करना था।

अनुच्छेद 13(3)(क) की जरूरत:

अनुच्छेद 13(3)(क) भारतीय संविधान में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जो यह निर्धारित करता है कि अगर कोई कानून संविधान के खिलाफ है तो वह असंवैधानिक होगा और उसे रद्द किया जा सकता है। विशेष रूप से यह उन कानूनों के बारे में है जो संविधान की मूल संरचना या उसकी मूलभूत प्रावधानों के खिलाफ हों।

जयपाल सिंह मुंडा की मांग: जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में इस प्रावधान की आवश्यकता महसूस की क्योंकि वे चाहते थे कि आदिवासी समाज के अधिकारों की संविधानिक सुरक्षा की जानी चाहिए। उनके अनुसार आदिवासी क्षेत्रों में कानूनी शोषण और भूमि हड़पने जैसी घटनाएं हो सकती थीं। इसलिए उन्होंने संविधान में एक ऐसे प्रावधान की मांग की जो यह सुनिश्चित करता कि आदिवासी क्षेत्रों में लागू होने वाले कानून संविधान के खिलाफ न हों और आदिवासी समाज के हितों की रक्षा हो।


1. आदिवासी भूमि अधिकारों की सुरक्षा:

जयपाल सिंह मुंडा का मानना था कि आदिवासी लोगों की भूमि और संसाधनों की रक्षा की जानी चाहिए, ताकि बाहरी लोग उनकी ज़मीन पर अवैध तरीके से कब्जा न कर सकें। अनुच्छेद 13(3)(क) आदिवासी भूमि और संसाधनों की रक्षा में महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह सुनिश्चित करता कि यदि कोई स्थानीय या अन्य बाहरी कानून आदिवासी अधिकारों के खिलाफ हो, तो उसे रद्द किया जा सकता है।

2. संविधान के अनुरूप स्थानीय कानून:

वे चाहते थे कि आदिवासी क्षेत्रों में लागू होने वाले कानून संविधान के अनुरूप हों, जिससे आदिवासी समाज को स्वतंत्रता, समानता और संविधानिक अधिकार मिल सकें।उनका यह भी तर्क था कि आदिवासी क्षेत्रों में लागू कानूनों को संविधान के मूल सिद्धांतों के अनुसार संरक्षित और लागू किया जाए, ताकि किसी भी प्रकार का शोषण न हो और आदिवासी समाज के पारंपरिक अधिकार सुरक्षित रहें।

जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में अनुच्छेद 13(3)(क) की मांग इसलिए की थी, ताकि आदिवासी क्षेत्रों में लागू होने वाले कानूनी प्रावधानों को संविधान के अनुसार संविधानिक सुरक्षा मिल सके और आदिवासी समाज को संविधानिक अधिकार और भूमि सुरक्षा मिल सके। उनके इस प्रयास का उद्देश्य था कि आदिवासी समाज को उनके कानूनी और सामाजिक अधिकारों की रक्षा मिले और उन्हें बाहरी शोषण से बचाया जा सके।

जयपाल सिंह मुंडा जी ने संविधान सभा में 5वीं और 6वीं अनुसूचियों की मांग की थी ताकि आदिवासी समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। उनका यह उद्देश्य था कि आदिवासी क्षेत्रों में उनके संस्कृति, भूमि, स्वायत्तता और संसाधनों की रक्षा की जा सके, और उन्हें बाहरी शोषण से बचाया जा सके।

5वीं और 6वीं अनुसूचियों की मांग की मुख्य वजहें:


1.आदिवासी समाज की विशिष्टता और उनकी स्वायत्तता की रक्षा:

जयपाल सिंह मुंडा का मानना था कि आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचान एक विशिष्ट स्थिति में है। इसलिए, उनके लिए विशेष प्रावधानों की आवश्यकता थी ताकि उनकी स्वायत्तता और संस्कृतिक अस्मिता सुरक्षित रहे।5वीं और 6वीं अनुसूचियाँ आदिवासी क्षेत्रों को स्वायत्तता देने और उनके परंपरागत जीवन के तरीकों को संविधानिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण थीं।

2. आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा:

जयपाल सिंह मुंडा ने हमेशा आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा की बात की थी। उनके अनुसार, आदिवासी समुदाय की भूमि और संसाधन बाहरी लोग हड़प न करें, इसके लिए विशेष सुरक्षा की जरूरत थी।

5वीं अनुसूची में आदिवासी क्षेत्रों में भूमि कब्जे और संविधानिक सुरक्षा के प्रावधान दिए गए थे, जो आज भी आदिवासी समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं।

3. आदिवासी क्षेत्रों का प्रशासन और स्थानीय स्वशासन:

6वीं अनुसूची विशेष रूप से उन राज्यों के लिए है जिनमें आदिवासी समाज का प्रचलन अधिक है, जैसे असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम। इसमें आदिवासी क्षेत्रों के लिए स्वायत्त शासी परिषदों का प्रावधान है, जो आदिवासी समाज के विकास और कल्याण की दिशा में काम करती हैं।

यह स्वायत्तता आदिवासी समुदाय को अपने स्थानीय शासन और संस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में मदद करती है।

4. संविधान में आदिवासी क्षेत्रों की विशेष पहचान:

जयपाल सिंह मुंडा ने 5वीं और 6वीं अनुसूचियों के माध्यम से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि आदिवासी समाज को संविधान में अपनी विशेष पहचान मिले। इन अनुसूचियों ने आदिवासी समुदाय के लिए विशेष कानूनी सुरक्षा प्रदान की, जिससे उन्हें समानता, स्वतंत्रता, और स्वायत्तता मिल सके।

5. आदिवासी समाज का शोषण रोकने की आवश्यकता:

जयपाल सिंह मुंडा का मानना था कि आदिवासी समाज का शोषण और बहिष्कार न हो। वे चाहते थे कि आदिवासी क्षेत्रों में कानूनी सुरक्षा और संविधानिक प्रावधानों के माध्यम से आदिवासी लोगों के संस्कृतिक और सामाजिक अधिकारों की रक्षा की जाए।

संविधान सभा में "अनुसूचित जनजाति" शब्द का विरोध मुख्य रूप से कुछ आदिवासी नेताओं और समाज सुधारकों द्वारा किया गया था, जिनमें जयपाल सिंह मुंडा का प्रमुख योगदान था। उनका विरोध इस शब्द के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव को लेकर था, क्योंकि वे इसे आदिवासी समाज के लिए नकारात्मक और अपमानजनक मानते थे।


विरोध के प्रमुख कारण:

1. सांस्कृतिक पहचान का संकट:

    जयपाल सिंह मुंडा और अन्य आदिवासी नेताओं का मानना था कि "अनुसूचित जनजाति" शब्द आदिवासी समुदाय की संस्कृति, इतिहास, और समाज को नकारता था। आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली के लिए पहचाना जाता है। इस शब्द से आदिवासियों को एक पिछड़े हुए और अविकसित समाज के रूप में चित्रित किया जाता था, जो उनके स्वाभिमान के खिलाफ था।

2. सामाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा का अभाव:

"अनुसूचित जनजाति" शब्द ने आदिवासी समाज को मुख्यधारा के समाज से कमतर और निचले स्तर का दिखाया। यह शब्द आदिवासी समुदाय को एक उपेक्षित और विकसित नहीं समाज के रूप में परिभाषित करता था, जिससे उनके मानवीय अधिकारों और सम्मान की रक्षा के प्रयासों को क्षति पहुँचती थी।

3. जातिवाद और भेदभाव का प्रोत्साहन

    जयपाल सिंह मुंडा का यह मानना था कि "अनुसूचित जनजाति" शब्द के तहत आदिवासी समुदाय को जातिवाद और भेदभाव का शिकार बनाया जाता था। यह शब्द उनके लिए एक सामाजिक श्रेणी का प्रतीक था, जो उन्हें मुख्यधारा से अलग कर देता था, जबकि उनकी संस्कृति और समाज में बहुत समृद्धि थी।

4. आत्मनिर्भरता की आवश्यकता:

   जयपाल सिंह मुंडा का यह भी तर्क था कि आदिवासी समाज को आत्मनिर्भर और स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए था। "अनुसूचित जनजाति" शब्द के तहत आदिवासी समाज को केवल एक पिछड़े हुए समुदाय के रूप में परिभाषित किया गया था, जबकि उनकी स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अस्मिता, और स्वाभिमान को बढ़ावा देना जरूरी था।

5. संविधान में समानता और अधिकार की मांग:

जयपाल सिंह मुंडा ने यह मांग की थी कि आदिवासी समाज को संविधान में एक समान अधिकार और सम्मानजनक पहचान मिलनी चाहिए। उनका यह मानना था कि "आदिवासी" शब्द का इस्तेमाल आदिवासी समुदाय के लिए एक सम्मानजनक पहचान हो सकता था, जो उनके संविधानिक अधिकारों और स्वतंत्रता को सुरक्षित रखता।

जयपाल सिंह मुंडा का दृष्टिकोण:

       जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासी समाज के लिए "अनुसूचित जनजाति" शब्द के बजाय "आदिवासी" शब्द का इस्तेमाल करने का समर्थन किया था, ताकि उन्हें एक स्वतंत्र, सशक्त, और सम्मानजनक पहचान मिले। उनका यह मानना था कि आदिवासी समुदाय को केवल एक पिछड़े हुए समूह के रूप में प्रस्तुत करने से उनकी संस्कृति, स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर सवाल उठते थे।

संविधान सभा में "अनुसूचित जनजाति" शब्द का विरोध आदिवासी नेताओं, विशेष रूप से जयपाल सिंह मुंडा, द्वारा किया गया था। उनका मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदाय को एक सम्मानजनक, स्वतंत्र, और स्वाभिमानी पहचान प्रदान करना था। उन्होंने इसे पिछड़ेपन और जातिवाद के प्रतीक के रूप में देखा और आदिवासी समाज के लिए एक अधिक समान, सम्मानजनक और सशक्त पहचान की मांग की।जयपाल सिंह मुंडा जी का निधन:

 जयपाल सिंह मुंडा का निधन 20 मार्च 1970 को हुआ था। वे दिल्ली में अपने आवास पर संदिग्ध अवस्था में मृत पाए गए थे।

जयपाल सिंह मुंडा का जीवन और उनका संघर्ष आदिवासी अधिकारों, उनके सामाजिक और राजनीतिक उत्थान के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। वे भारतीय संविधान सभा के सदस्य रहे और आदिवासी समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके योगदान को आदिवासी समाज और भारतीय राजनीति में सदैव सम्मानित किया जाता है।


उनके मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न से नवाजने की मांग की सुगबुगाहट जरूर दिखी, लेकिन ये तब तक संभव नहीं दिखती जब तक कि सामाजिक न्याय की पक्षधर पार्टियां एकजुट होकर इसके लिए आगे ना आएं।

आदिवासियों की तरफ से उन्होंने सविधान सभा में बोलते हुए कहा था कि, “एक जंगली और आदिवासी समुदाय से आने वाले व्यक्ति के रूप में मुझे प्रस्ताव के कानूनी बारिकीयों का ज्ञान तो नहीं है। लेकिन मेरा सामान्य ज्ञान कहता है कि आजादी और संघर्ष की लड़ाई में हर एक व्यक्ति को कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहिए। अगर पूरे भारत में किसी के साथ ऐसा खराब सलूक किया जाता है तो वह मेरे लोग हैं।” जयपाल सिंह मुंडा के कारण आदिवासियों को संविधान में कुछ विशिष्ट अधिकार मिल सके, लेकिन व्यवहार में उनका शोषण अब भी जारी है। वे आजीवन आदिवासी अधिकारों, सभ्यता व अस्मिता के साथ साथ 50 प्रतिशत की अधिक आदिवासी जनसंख्या वाले छोटानागपुर एजेंसी और संथाल परगना को मिलाकर आदिवासी राज्य की स्थापना करना चाहते थे। उनकी आदिवासियों से संबंधित कई मांग पूरी कर नहीं हुई और न ही झारखंड राज्य बनाया गया जिसका नतीजा यह रहा कि आदिवासी इलाकों में शोषण, विस्थापन, नरसंहार, फर्जी हत्याकांड, अशिक्षा, गरीबी नक्सलवाद जैसी समस्या पैदा हो गई। जो आज भी देश में परेशानी का सबब बनी हुई है। सन् 2000 में झारखंड राज्य के निर्माण के साथ उनकी मांग आंशिक रूप से पूरी तो लेकिन तब तक आदिवासियों की संख्या राज्य में घटकर करीब 26 फीसद ही बची। 1951 में यह 51% हुआ करती थी।


आदिवासियों से संबंधित मामलों में ऐसा अनेकों बार हुआ, जिस पर जयपाल सिंह मुंडा ने बार – बार आपत्ति की। आदिवासी समाज में उनका योगदान अविस्मरिनीय है लेकिन उनकी बहुत सी मानवीय आकांक्षाएँ और कमजोरियाँ उन्हे वो मुकाम नहीं दिला सकीं जो उनके समकालीन अन्य नेताओं और समाज सेवकों को हासिल हुईं। एक अकेला इंसान सब कुछ नहीं कर सकता।


जयपाल सिंह मुंडा को आदिवासी सर्वोच्च मरांग गोमके के नाम से पुकारते हैं। मरांग गोमके मुंडारी शब्द है, जिसका अर्थ है सर्वोच्च नेता। वे एक सर्वोच्च नेता ही थे जिसे न ही आदिवासियों के हितैषियों ने और न ही इस देश ने याद रखा, दुर्भाग्य की बात तो यह है कि उसके बाद उन्हें भुला दिया गया। आज ऐसे ही महामानव की जरूरत है जिनके बारे में एक एक आदिवासी जाने और आजाद भारत में अपने सच्चे पैरोकार को याद करे।



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